वन पर्व  अध्याय ५३

देवा ऊचुः

कच्चिद्दृष्टा त्वय़ा राजन्दमय़न्ती शुचिस्मिता |  १४   क
किमव्रवीच्च नः सर्वान्वद भूमिपतेऽनघ ||  १४   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति