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उद्योग पर्व
अध्याय ४५
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सनत्सुजात उवाच
गूहन्ति सर्पा इव गह्वराणि; स्वशिक्षय़ा स्वेन वृत्तेन मर्त्याः |  १८   क
तेषु प्रमुह्यन्ति जना विमूढा; यथाध्वानं मोहय़न्ते भय़ाय़ |  १८   ख
योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ||  १८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति