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वन पर्व
अध्याय ५३
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वृहदश्व उवाच
अहं चैव हि यच्चान्यन्ममास्ति वसु किञ्चन |  २   क
सर्वं तत्तव विश्रव्धं कुरु प्रणय़मीश्वर ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति