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वन पर्व
अध्याय २०३
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व्राह्मण उवाच
सत्त्वस्य रजसश्चैव तमसश्च यथातथम् |  २   क
गुणांस्तत्त्वेन मे व्रूहि यथावदिह पृच्छतः ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति