वन पर्व  अध्याय ५३

वृहदश्व उवाच

विप्रिय़ं ह्याचरन्मर्त्यो देवानां मृत्युमृच्छति |  ७   क
त्राहि मामनवद्याङ्गि वरय़स्व सुरोत्तमान् ||  ७   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति