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विराट पर्व
अध्याय ५३
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वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्राध्मापय़च्छङ्खं भेरीशतनिनादितम् |  १०   क
प्रचुक्षुभे वलं सर्वमुद्धूत इव सागरः ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति