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विराट पर्व
अध्याय ५३
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वैशम्पाय़न उवाच
हर्षय़ुक्तस्तथा पार्थः प्रहसन्निव वीर्यवान् |  १४   क
रथं रथेन द्रोणस्य समासाद्य महारथः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति