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विराट पर्व
अध्याय ५३
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वैशम्पाय़न उवाच
अहं तु प्रहृते पूर्वं प्रहरिष्यामि तेऽनघ |  १७   क
इति मे वर्तते वुद्धिस्तद्भवान्कर्तुमर्हति ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति