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विराट पर्व
अध्याय ५३
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अर्जुन उवाच
अश्वाः शोणाः प्रकाशन्ते वृहन्तश्चारुवाहिनः |  २   क
स्निग्धविद्रुमसङ्काशास्ताम्रास्याः प्रिय़दर्शनाः |  २   ख
युक्ता रथवरे यस्य सर्वशिक्षाविशारदाः ||  २   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति