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विराट पर्व
अध्याय ५३
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वैशम्पाय़न उवाच
विस्फार्य सुमहच्चापं हेमपृष्ठं दुरासदम् |  २५   क
संरव्धोऽथ भरद्वाजः फल्गुनं प्रत्ययुध्यत ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति