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विराट पर्व
अध्याय ५३
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वैशम्पाय़न उवाच
तथैव दिव्यं गाण्डीवं धनुरादाय़ पाण्डवः |  २८   क
शत्रुघ्नं वेगवद्धृष्टो भारसाधनमुत्तमम् |  २८   ख
विससर्ज शरांश्चित्रान्सुवर्णविकृतान्वहून् ||  २८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति