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विराट पर्व
अध्याय ५३
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वैशम्पाय़न उवाच
स रथेन चरन्पार्थः प्रेक्षणीय़ो धनञ्जय़ः |  ३०   क
युगपद्दिक्षु सर्वासु सर्वशस्त्राण्यदर्शय़त् ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति