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विराट पर्व
अध्याय ५३
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वैशम्पाय़न उवाच
एकच्छाय़मिवाकाशं वाणैश्चक्रे समन्ततः |  ३१   क
नादृश्यत तदा द्रोणो नीहारेणेव संवृतः ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति