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विराट पर्व
अध्याय ५३
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वैशम्पाय़न उवाच
शरास्तय़ोश्च विवभुः कङ्कवर्हिणवाससः |  ३९   क
पङ्क्त्यः शरदि खस्थानां हंसानां चरतामिव ||  ३९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति