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विराट पर्व
अध्याय ५३
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अर्जुन उवाच
वुद्ध्या तुल्यो ह्युशनसा वृहस्पतिसमो नय़े |  ४   क
वेदास्तथैव चत्वारो व्रह्मचर्यं तथैव च ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति