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विराट पर्व
अध्याय ५३
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वैशम्पाय़न उवाच
तौ गजाविव चासाद्य विषाणाग्रैः परस्परम् |  ४१   क
शरैः पूर्णाय़तोत्सृष्टैरन्योन्यमभिजघ्नतुः ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति