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विराट पर्व
अध्याय ५३
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वैशम्पाय़न उवाच
दर्शय़न्नैन्द्रिरात्मानमुग्रमुग्रपराक्रमः |  ४४   क
इषुभिस्तूर्णमाकाशं वहुभिश्च समावृणोत् ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति