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विराट पर्व
अध्याय ५३
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वैशम्पाय़न उवाच
जिघांसन्तं नरव्याघ्रमर्जुनं तिग्मतेजसम् |  ४५   क
आचार्यमुख्यः समरे द्रोणः शस्त्रभृतां वरः |  ४५   ख
अर्जुनेन सहाक्रीडच्छरैः संनतपर्वभिः ||  ४५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति