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विराट पर्व
अध्याय ५३
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वैशम्पाय़न उवाच
ऐन्द्रं वाय़व्यमाग्नेय़मस्त्रमस्त्रेण पाण्डवः |  ४८   क
द्रोणेन मुक्तं मुक्तं तु ग्रसते स्म पुनः पुनः ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति