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विराट पर्व
अध्याय ५३
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वैशम्पाय़न उवाच
एवं शूरौ महेष्वासौ विसृजन्तौ शिताञ्शरान् |  ४९   क
एकच्छाय़ं चक्रतुस्तावाकाशं शरवृष्टिभिः ||  ४९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति