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द्रोण पर्व
अध्याय ९५
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सञ्जय़ उवाच
अतोऽन्यं पृतनाशेषं मन्ये कुनदिकामिव |  ५   क
तर्तव्यामल्पसलिलां चोदय़ाश्वानसम्भ्रमम् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति