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विराट पर्व
अध्याय ५३
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वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽर्जुनेन मुक्तानां पततां च शरीरिषु |  ५०   क
पर्वतेष्विव वज्राणां शराणां श्रूय़ते स्वनः ||  ५०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति