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विराट पर्व
अध्याय ५३
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वैशम्पाय़न उवाच
ततो नागा रथाश्चैव सादिनश्च विशां पते |  ५१   क
शोणिताक्ता व्यदृश्यन्त पुष्पिता इव किंशुकाः ||  ५१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति