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द्रोण पर्व
अध्याय ५६
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सञ्जय़ उवाच
एवं कथय़तां तेषां जय़माशंसतां प्रभो |  १६   क
कृच्छ्रेण महता राजन्रजनी व्यत्यवर्तत ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति