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विराट पर्व
अध्याय ५३
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वैशम्पाय़न उवाच
तथा शीघ्रास्त्रय़ुद्धे तु वर्तमाने सुदारुणे |  ६१   क
शीघ्राच्छीघ्रतरं पार्थः शरानन्यानुदीरय़त् ||  ६१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति