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विराट पर्व
अध्याय ५३
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वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डवस्य तु शीघ्रास्त्रं मघवान्समपूजय़त् |  ६४   क
गन्धर्वाप्सरसश्चैव ये च तत्र समागताः ||  ६४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति