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विराट पर्व
अध्याय ५३
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वैशम्पाय़न उवाच
ततो वृन्देन महता रथानां रथय़ूथपः |  ६५   क
आचार्यपुत्रः सहसा पाण्डवं प्रत्यवारय़त् ||  ६५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति