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विराट पर्व
अध्याय ५३
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वैशम्पाय़न उवाच
अश्वत्थामा तु तत्कर्म हृदय़ेन महात्मनः |  ६६   क
पूजय़ामास पार्थस्य कोपं चास्याकरोद्भृशम् ||  ६६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति