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विराट पर्व
अध्याय ५३
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वैशम्पाय़न उवाच
स मन्युवशमापन्नः पार्थमभ्यद्रवद्रणे |  ६७   क
किरञ्शरसहस्राणि पर्जन्य इव वृष्टिमान् ||  ६७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति