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विराट पर्व
अध्याय ५३
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वैशम्पाय़न उवाच
आवृत्य तु महावाहुर्यतो द्रौणिस्ततो हय़ान् |  ६८   क
अन्तरं प्रददौ पार्थो द्रोणस्य व्यपसर्पितुम् ||  ६८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति