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विराट पर्व
अध्याय ५३
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वैशम्पाय़न उवाच
स तु लव्ध्वान्तरं तूर्णमपाय़ाज्जवनैर्हय़ैः |  ६९   क
छिन्नवर्मध्वजः शूरो निकृत्तः परमेषुभिः ||  ६९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति