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उद्योग पर्व
अध्याय ५३
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सञ्जय़ उवाच
वानरो रोचमानश्च केतुः केतुमतां वरः |  १३   क
एवमेतानि सरथो वहञ्श्वेतहय़ो रणे |  १३   ख
क्षपय़िष्यति नो राजन्कालचक्रमिवोद्यतम् ||  १३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति