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वन पर्व
अध्याय ११५
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अकृतव्रण उवाच
गङ्गाय़ां कन्यकुव्जे वै ददौ सत्यवतीं तदा |  १७   क
ततो गाधिः सुतां तस्मै जन्याश्चासन्सुरास्तदा |  १७   ख
लव्ध्वा हय़सहस्रं तु तांश्च दृष्ट्वा दिवौकसः ||  १७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति