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भीष्म पर्व
अध्याय ५३
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सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्युद्धे महारौद्रे वर्तमाने सुदारुणे |  २४   क
प्रत्यदृश्यन्त रथिनो धावमानाः समन्ततः ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति