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भीष्म पर्व
अध्याय ५३
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सञ्जय़ उवाच
तथा ते समरेऽन्योन्यं निघ्नन्तः क्षत्रिय़र्षभाः |  २९   क
रक्तोक्षिता घोररूपा विरेजुर्दानवा इव ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति