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द्रोण पर्व
अध्याय ५३
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सञ्जय़ उवाच
तां न देवा न गन्धर्वा नासुरोरगराक्षसाः |  १४   क
उत्सहन्तेऽन्यथा कर्तुं प्रतिज्ञां सव्यसाचिनः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति