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भीष्म पर्व
अध्याय ५३
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सञ्जय़ उवाच
उदतिष्ठद्रजो भौमं छादय़ानं दिवाकरम् |  ५   क
दिशः प्रतिदिशो वापि तत्र जज्ञुः कथञ्चन ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति