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वन पर्व
अध्याय १९४
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मार्कण्डेय़ उवाच
स्वकावनावृतावूरू दृष्ट्वा देववरस्तदा |  ३०   क
मधुकैटभय़ो राजञ्शिरसी मधुसूदनः |  ३०   ख
चक्रेण शितधारेण न्यकृन्तत महाय़शाः ||  ३०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति