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द्रोण पर्व
अध्याय ५३
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सञ्जय़ उवाच
वासुदेवसहाय़स्य गाण्डीवं धुन्वतो धनुः |  २०   क
कोऽर्जुनस्याग्रतस्तिष्ठेत्साक्षादपि शतक्रतुः ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति