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द्रोण पर्व
अध्याय ५३
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सञ्जय़ उवाच
महेश्वरोऽपि पार्थेन श्रूय़ते योधितः पुरा |  २१   क
पदातिना महातेजा गिरौ हिमवति प्रभुः ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति