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द्रोण पर्व
अध्याय ५३
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सञ्जय़ उवाच
समाय़ुक्तो हि कौन्तेय़ो वासुदेवेन धीमता |  २३   क
सामरानपि लोकांस्त्रीन्निहन्यादिति मे मतिः ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति