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द्रोण पर्व
अध्याय ५३
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सञ्जय़ उवाच
स राज्ञा स्वय़माचार्यो भृशमाक्रन्दितोऽर्जुन |  २५   क
संविधानं च विहितं रथाश्च किल सज्जिताः ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति