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द्रोण पर्व
अध्याय ५३
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सञ्जय़ उवाच
भूय़श्च चिन्तय़िष्यामि नीतिमात्महिताय़ वै |  ३०   क
मन्त्रज्ञैः सचिवैः सार्धं सुहृद्भिः कार्यसिद्धय़े ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति