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द्रोण पर्व
अध्याय ५३
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अर्जुन उवाच
षड्रथान्धार्तराष्ट्रस्य मन्यसे यान्वलाधिकान् |  ३१   क
तेषां वीर्यं ममार्धेन न तुल्यमिति लक्षय़े ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति