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द्रोण पर्व
अध्याय ५३
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अर्जुन उवाच
तथापि वाणैर्निहतं श्वो द्रष्टासि रणे मय़ा |  ३७   क
सत्येन ते शपे कृष्ण तथैवाय़ुधमालभे ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति