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द्रोण पर्व
अध्याय ५३
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अर्जुन उवाच
नरनागाश्वदेहेभ्यो विस्रविष्यति शोणितम् |  ४१   क
पतद्भ्यः पतितेभ्यश्च विभिन्नेभ्यः शितैः शरैः ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति