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द्रोण पर्व
अध्याय ५३
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अर्जुन उवाच
यमात्कुवेराद्वरुणाद्रुद्रादिन्द्राच्च यन्मय़ा |  ४३   क
उपात्तमस्त्रं घोरं वै तद्द्रष्टारो नरा युधि ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति