वन पर्व  अध्याय ८३

पुलस्त्य उवाच

ततो गिरिवरश्रेष्ठे चित्रकूटे विशां पते |  ५५   क
मन्दाकिनीं समासाद्य नदीं पापप्रमोचनीम् ||  ५५   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति