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द्रोण पर्व
अध्याय ५३
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अर्जुन उवाच
सर्वक्षीरान्नभोक्तारः पापाचारा रणाजिरे |  ४८   क
मय़ा सराजका वाणैर्नुन्ना नङ्क्ष्यन्ति सैन्धवाः ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति