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द्रोण पर्व
अध्याय ५३
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सञ्जय़ उवाच
यथा प्रभातां रजनीं कल्पितः स्याद्रथो मम |  ५६   क
तथा कार्यं त्वय़ा कृष्ण कार्यं हि महदुद्यतम् ||  ५६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति